Wednesday, January 25, 2012

नायक की परिभाषा

हर श्रवण को लगा है, दशरथ का तीर
हर चौराहे पे लुटता है, किसी द्रौपदी का चीर
कहने को तो हैं, चारो ओर पांडव जैसे वीर
पर चुपचाप मर्यादा को लुटता देखना, है उनकी तकदीर

बिना आत्मा के जी रहे हैं.... ये शरीर
लेकिन आज हर आत्मा का बल चाहिए

आज चाहिए.... कृष्ण का छल
जो करे.... इस समर का हल

राजनीति की इन गलियों को
..... एक नया भविष्य चाहिए
सत्ता के इन प्यासों को
.... अब अमृत नहीं एक घूँट विष चाहिए
विदुर की नीति नहीं......
............ आज एक चाणक्य चाहिए
फकीर तो बहुत हुए..... आज एक वीर चाहिए

टीपू सा सुल्तान चाहिए,
..........पानीपत का मैदान चाहिए
भीष्म की प्रतिज्ञा और कर्ण का दान चाहिए
परिस्थिति में फंसे कुछ कदमों को आज फिर गीता का ज्ञान चाहिए

आँखों से आंसू नहीं, अब एक आग चाहिए
आज ग़ज़ल नहीं, सरफ़रोशी का राग चाहिए

कोमलांगी नहीं..... झाँसी की वीरांगना चाहिए
.....काली का साक्षात अवतार चाहिए......
आज हाथों में मेहँदी नहीं, हौसलों का संसार चाहिए
न कुछ कर पाओ तो..... पद्मा के जौहर का विस्तार चाहिए

आदमियों की इस भीड़ से .............
............... आज हमें इंसान चाहिए
समाज को अब बदलना है ..............
........ बस बदलने के लिए वो हाथ चाहिए

वास्तव में समाज को ऊँचे कद की ज़रुरत है
..... .ऐसा कद जो आसमान को छू जाए
पर ज़मीन से किसी को उठाने में ना हिचकिचाए
हर ग़म में खुद आंसू बहाए ...........
....... हर दर्द को खुद महसूस कर जाए

हाँ समाज को आज ऐसा व्यक्तित्व चाहिए.....
नायक की परिभाषा को एक नया अस्तित्व चाहिए


---------------------------------------- नीलाभ

--Expressions: This poem was written long ago while I was a student and as every young citizen feels the nation needed to change, I too felt the same.As the time passed on with varied socio-political-economic challenges ahead for our nation, this thought of change has only strengthened. But this change would need a revolution and every revolution needs a HERO.This poem simply describes my idea of hero by mentioning about some unique personalities of past in both history and mythologies that have inspired me ever since my childhood and it so draws attention towards their heroic deeds.

On this republic day I would dedicate this poem to all those HEROES in making who are still standing tall against a fragile system and in a phase of time that is filled with angst,anger and at the same time also accompanied with hope.


श्रवण (Shravan) = a Mythological character in Ramayana, who exhibited unparalleled devotion toward his parents and was accidentally killed by King Dashratha, while the latter was hunting.
दशरथ (Dashratha)= a Mythological character in Ramayana, King of Ayodhya, Father of Lord Rama, killed Shravan accidentally and was cursed by Shravan's dying parents to bear the agony of separation from his son which later resulted in his death.
समर = battle
विदुर (Vidur) = a Mythological character in Mahabharta, Prime Minister and Half Brother of King Dhritrashtra, Most respected advisory for his righteousness, devotion to the people's welfare, wisdom and statecraft.
चाणक्य(Chanakya) = Prime minister to Chandragupta Maurya around 350 BC, considered as the architect of Maurya empire; by his political tactics aided Chandragupta's rise as Emperor, famous as a genius in fields of political science and economics. Also known as Kautilya.
टीपू(Tipu) = Known as Tipu Sultan, Ruler of Mysore Kingdom around 1750-1800 AD, fought several battles with British to protect the sovereignty of his land.
पानीपत(Panipat) = a place in Northen India, close to Delhi, famous as battle ground where three major battles(Known as Battle of Panipat) were fought, that changed the course of Indian History.
भीष्म(Bheeshma/Bhishma) = a Mythological character in Mahabharta, famous for his vow of life-long celibacy, sacrificing his 'crown-prince' title for his half-brother and his descendants and protecting the kinship until his death.
कर्ण (Karna) = AntiHero of Mahabharta, one of the greatest warrior, who fought against misfortune throughout his life and kept his word under all circumstances. Famous for his charity and earned the name of 'daanveer' -lord of charity. Died in battle of Kurukshetra fighting against his own brothers for his friend Duryodhan(prime antagonist of Mahabharata)
सरफ़रोशी = sacrifice
कोमलांगी = one with a delicate body (used for the delicacy associated with a lady)
वीरांगना = warrior lady
पद्मा (Padma) = known as Rani Padmini, Queen of Chittor, chose to commited mass suicide (called Jauhar/जौहर) with all other women of Chittor by burning themselves in a huge pyre rather than face dishonour at the hands of the victorious enemy, when her husband Ratan Singh King of Chittor was defeated and died in battle protecting Chittor from invaders from Delhi Sultnate.
विस्तार = enhancement.

Thursday, April 14, 2011

जेब में रखा आखिरी सौ का नोट.......

जेब में रखा आखिरी सौ का नोट,
.... देख कर मुझे मुस्कुराता है
हँस कर पूछता है.. तारीख क्या है आज बता ज़रा
उँगलियों से ज्यादा, हैं दिन इस महीने के बाकी
मेरी बात पे ना हो यकीन, तो गिन के देख ले आज साकी
घबराया हुआ.... मैं जोड़ता हूँ तारीखें
इस मुसीबत से निकलने की, ढूँढता हूँ मैं तरकीबें
पर हो जो खाली तरकश, क्या ख़ाक निशाना सीखें
महीने का पहला दिन फिर क्या कहूं
..........कितना याद आता है
जेब में रखा आखिरी सौ का नोट,
.... देख कर मुझे मुस्कुराता है


अचानक मुझे हर दिन, एक सवाल सा लगता है
बचा हुआ महीना, किसी बुरे ख़याल सा लगता है
सोचता हूँ...... गुज़ारा कैसे होगा आगे
देगा कौन उधार, इसी ख़याल में मन जाने कहाँ भागे
खर्च करू या बचत, इस बात की जंग अब जोर पकडती है
बस की कतार क्यों लम्बी....... कुछ ज्यादा आज लगती है
घिसे हुए जूतों पे और जोर देना.... अब तो मजबूरी लगती है
मेरे माथे पे देख के शिकन की लकीरें
............... वो इठलाता है
जेब में रखा आखिरी सौ का नोट,
.... देख कर मुझे मुस्कुराता है


यार दोस्त भी अब............. पराये से लगते हैं
जो वापस मांगते हैं उधार, वो जल्लाद के साए लगते हैं
मुस्कुराती सखियों को देख......... अब नज़रें फेर लेता हूँ
चाय पर चलने को वो पूछें, इससे पहले मैं बिल जोड़ लेता हूँ
फिर मेरे ज़हन में ख्याल....... उन सैकड़ों परिंदों का आता है
ख्वाब उड़ने का आँखों में रख, जिन्हें आसमान नहीं मिल पाता है
छोटा ही सही मेरे नसीब में........ मेरा आसमान तो आता है
थोड़ा ही सही पर इस आखिरी नोट को देख
..............अब सुकून सा आता है
जेब में रखा आखिरी सौ का नोट,
.... देख कर मुझे मुस्कुराता है

---------------------------------------- नीलाभ

तरकश = quiver

--Expressions: Somethings in life can't be measured and what can be measured doesn't always gives life a meaning. A thought which tries to figure out balance between both these facts and ends up bringing a smile of satisfaction.
This idea emerged with a random funny thought when the bills weighed more than the amount I had and the idea finally flourished to what you read.

Saturday, March 26, 2011

चले जाते हैं ........

दिल से करो कोशिश तो बनते हैं रिश्ते
इश्क कब का रुसवा हुआ हमसे.....
अब हम कोशिशों से जीए जाते हैं

बेवाफईयों से उनकी हमने भी एक सौदा कर लिया
हम उनकी बेवफाई.....................
और वो हमारी वफ़ा को नज़रंदाज़ किये जाते हैं

उनका दामन पाक तो था हमेशा
वो हमारी नेकी ...........
उनके जुर्म हम अपने सर लिए जाते हैं

रुसवाई कम ना मिली हमें उनसे
याद करना तो दूर..........
मिल के अब नाम पूछे जाते हैं

उनकी सलामती पर बैर खुदा से हमने कर लिया
उन्हें मिली जन्नत ...................
और हम काफिर कहे जाते हैं

इश्क की गली में आज भी घर है उनका
बस हम ही आज ..............
ज़रा उस दर पे कम जाते हैं

---------------------------------------- नीलाभ


--Expressions: The most common topic for any poet, brilliantly explained by many is "Love".... But Love stills has age old definitions and often depicts another never changing emotion pain.... So this effort describes yin-yang relationship between Love and Pain .... Just another expression.

काफिर = non- believer, atheist

Sunday, January 30, 2011

मकान एक पुराना सा

बड़ी इमारतों के बीच एक मकान कुछ पुराना सा है....
बेजान तहजीबों के शहर में जैसे भटका कोई मुसाफ़िर बेग़ाना सा है....

कभी ऊंचे पर्वत सी शिलाओं को देख मेरा मकान पुराना घबराता सा है
कभी इन सजीले नव आगंतुओ को देख कुछ शर्माता सा है
नए नवेले युवाओं को देख अपनी उम्र छुपाता सा है
वैभव देख उनकी अपना सर झुकाता सा है

कभी अपनी जीर्ण अवस्था पर मन ही मन आँसू बहाता सा है
जीवन के बिखरे पालो को समेट फिर भरमाता सा है
नव वधुओं के स्वागत को कर स्मरित लजाता सा है
अपने आँगन में खेले बच्चों को कर याद मुस्काता सा है

याद करता है रिश्तों की पूँजी को बढ़ते हुए
दादा को पोते के साथ फिर बच्चा बनते हुए
माँ की लोरी सुन खुद भी सो जाता सा है
पिता के कंधो पे नयी पीढ़ी को बिठाता सा है

होली पे प्रेम के रंगों में भर जाता सा है
दीवाली पे झिलमिल जगमगाता सा है
तीज पे हरियाली की समृद्धि दे जाता सा है
चौथ पे चाँद को आँगन में उतार लाता सा है

आगे बढ़ने की होड़ में... हाँ आज पीछे रह जाता सा है
पर याद कर अपने अतीत को गर्व से हर्षाता सा है

---------------------------------------- नीलाभ


--Expressions: With change in times somethings still remain the same.... Lets accept those unchanged ones and give them the respect they deserve.... because they are the roots to where we actually belong.

तहजीबों = manners/culture
आगंतुओ = visitors

Sunday, July 4, 2010

कुछ अलग से लोग हैं...

हाँ कुछ अलग से लोग हैं......
शहर भी कुछ अलग सा है....

चेहरों पे जाने कितने चेहरें
सच का रंग है कच्चा और झूठ के दाग हैं गहरे
जिंदगी को समझते हैं बिसात
.......................... हैं इंसानों को समझते मोहरे
भावनाओँ की ना थी कोई जगह, ना कोई काम है
फायदे का गर है सौदा, तो खुशी के भी दाम हैं
हाँ कुछ अलग से लोग हैं......
शहर भी कुछ अलग सा है....

खुदा के घर पे ठहरा है सन्नाटा
पर रस्ता जो बदल के देखा तो मयखानों में है भीड़
ऊँचे मकान तो है मगर
................. मिलता नहीं क्यों प्यार से भरा एक नीड़
इंसानीयत है अपाहिज यहाँ, और मासूमियत अनाथ है
पैमाने है मिल के छलकते, आंसू जो छलके तो देता नहीं कोई साथ है
हाँ कुछ अलग से लोग हैं......
शहर भी कुछ अलग सा है....

बदले सोच जैसे बदले है धूप
बदलती परिभाषाओं में सुंदरता भी है कुरूप
अस्मिता को मार स्वयं ठोकर
......................... नारी का है ये नया रूप
सड़कों के किनारे घुमते बच्चे , कुछ असहाय कुछ अधनंगे हैं
सादगी है मर चुकी और चेहरे बस दिखावों के रंगों से रंगे हैं
हाँ कुछ अलग से लोग हैं......
शहर भी कुछ अलग सा है....


---------------------------------------- नीलाभ


--Expressions: Times have changed, so have people or is this a different place with different people at different times.

नीड़ = Nest
अस्मिता = Dignity

साये की रात.........

आधी रात को दूर एक शहर..... कुछ सोता कुछ जागता सा है....
कुछ घर अँधेरे की आगोश में यूँ झिलमिलाते हैं
अंदर रहने वालों का हाल सा बता जाते है
कभी दूर एक सड़क भी दिखाई देती है
वहीँ लगी रौशनी से वो नहाई सी लगती है
हाँ वहीँ सड़क के किनारे कुछ साये भी हैं
सच कहूँ तो इंसान नहीं....... वो साये ही हैं
रात के अँधेरे में समा से जाते हैं वो साये
सडक पर फैली धुंध में खो से जाते साये

पूस की रात में एक झोंका हवा का चलता है
एक ठिठुरन सी मेरे अंदर भरता है

मैं फिर सड़क के किनारे उन सायों को देखता हूँ
उनके तन पर सिमटे कुछ कपड़ों को देखता हूँ
कपड़े नहीं.. चीथड़ों में लिपटे
उन शरीरों को भी ठिठुरते देखता हूँ
ज़िंदा रहने का संघर्ष कुछ और ज़ोर पकड़ता है
जीने की ख्वाहिश लिए एक साया और दम तोड़ता है
रात ने फिर इंसान से मुँह फेरकर किया जिंदगी से दगा है
मौत ने मुस्कुरा कर एक बेसहारे को साथ ले लिया है
पर इंसानों की बस्ती से आज कौन रुखसत हुआ है?

हौसले और संघर्ष से भरा मिटटी का एक और शरीर ढह गया है
और उज्जवल भविष्य का सपना लिए आँखें मूँद समाज सो गया है


-------------------------------- नीलाभ


--Expressions: Some varied thoughts, some varied feelings, some varied emotions, some varied truths and just an expression.

लौटा दो..................

कुछ पुरानी किताबें लौटा दो
उन किताबों पे बनी तस्वीर लौटा दो
साथ लौटा दो वो कहानियाँ
जिन कहानियों में शेर और चूहों की थी दोस्ती
लौटा दो वो किस्से
जहाँ इमानदारी की सीख थी मिलती
वो रेत के महल, वो मिटटी के खिलौने लौटा दो
या मेरे कागज के हवाई जहाजों को, उड़ने का फिर एक मौका दो

कुछ अनजान से सवाल लौटा दो
मासूम से मेरे जवाब लौटा दो
छुट्टियाँ वो गर्मी की लौटा दो
वो जाड़े की अलाव लौटा दो

मेरा कुछ और भी था
जो खो गया था बड़े होने की होड़ में
कभी ज़िंदगी से कदम मिलाने
तो कभी उससे जीतने की दौड़ में
हो सके तो लौटा दो वो सुकून की नींद
जो आती माँ के गोद में
या फिर पिता के हौसला देते हाथ
जिन्हें पकड़ कर सीखा गिरकर संभालना हर बार

गर ये लौटा ना पाओ तो बस एक आरज़ू लौटा दो
कुछ खेलने कुछ जीतने की ख्वाहिश लौटा दो
साथ लौटा दो वो नादानी जो सिखाती थी साथ देना सिर्फ सच का
वो भोलापन जो बताता था फर्क अच्छे और बुरे का

वो मासूमियत जो मेरे चेहरे से खो गयी
और लौटा दो वो इंसानियत जो दिल के किसी कोने में सो गयी

--------------------------------- नीलाभ

--Expressions: There are somethings in life which are often missed as time passes by. One of them is the time when we grow up..... Everything during this period is the best of the things that just happen once in a lifetime and throughout the life we want them back.