Friday, June 2, 2023

मैं वृक्ष पुराना..

 मैं वृक्ष पुराना इस जंगल का.. 

कितने वसंत कितने पतझड़ का..


मेरे कोपलों पे हैं ..

कितनी तितलियां मंडराई,

मेरे कंधो पे है..

कभी गिलहरियां भी सुस्ताई,

मेरे बाजुओं पे चढ़ने..

रीछों ने नख हैं चुभाए,

सर्पों ने कर मेरा आलिंगन.. 

मुझ पर विष भी हैं बरसाए,

फिर भी हर आगंतुक से.. की है मैंने यारी

पर नियति का खेल है ये..  बिछड़े सभी हैं बारी बारी ॥


एक पतझड़ की बात सुनाऊं..

कुछ हिरणों के छौने आए,

भर कर जाने.. कितने कुलांचे,

ठहर चुके थे.. थक कर सारे,

छांव में मेरी.. तनिक वो ठहरे,

प्रेम से मेरी.. ओर निहारे,

कुछ पल ठहरे.. कुछ पल ठिठके,

फिर हवा से वापस.. दौड़ लगाई,

हां नियति का खेल यही है..  बिछड़े सभी हैं बारी बारी ॥

मैं वृक्ष पुराना इस जंगल का ..

कितने वसंत कितने पतझड़ का ॥


दूर खड़े कुछ वृक्ष पुराने..

मुझसे बड़े वो हैं जो सयाने,

हाथ उठा.. आशीष वो देते, 

कभी गरज के.. सीख वो देते,

वो कहते.. ये काल का रथ है,

तेरे पास भी.. देख तो सब है,

पर रुक कर कुछ.. ना रह पाएगा,

हर स्नेह का बंधन.. हाँ खुल जाएगा,

जो प्रेम से आज पास आया है..

वो प्रेम ही देकर कल जाएगा,

मैं शीश नवा कर सब सुनता हूं..

फिर आंख मूंद कर मैं कहता हूं,

मैं वृक्ष पुराना इस जंगल का..

कितने वसंत कितने पतझड़ का ॥


------------------------------------------ नीलाभ

Expression - As I turn a year older and gradually enter in the second half of this journey called life. I try to juggle my bitter sweet experiences, balncing between them, adjusting to new and holding to the old.. and living this journey of life. 

कोपलों = Buds
रीछों = Bear
आलिंगन = Embrace
आगंतुक = Guest
छौने = Fawn

Thursday, December 31, 2020

एक साल नया..

एक साल नया है फिर आया,
मुझसे कहने....
मेरी सुनने....
कोई बात नई है फिर लाया ।।

एक बीत गया, लेकर जो गया
यादें कई, देकर भी गया,
कुछ गवां दिया और खो भी गया,
लेकिन सोचें क्या है पाया ।।

 कुछ यार मिले, हाँ ख़ास मिले,
कुछ ख़ुशी मिली, कुछ मिटे गिले,
हुआ कहीं सफ़र, ये आसान भी,
जो हम मिलकर, यूँ साथ चले ।।

आंधी तूफ़ान, कितने मौसम,
कितनी खुशियाँ और थोड़े ग़म,
बीते लम्हों से जो भी मिला,
है सर आँखों पे हमने लिया,
आगे बेहतर कुछ और मिले,
जीवन में रंग उमंग खिले ।।

फिर घड़ी के काँटे जो सरकें,
और सूरज हौले से चमके,
फिर हमने भी जो माँगा है,
वो दुआ तेरे दर तक पहुँचे,
और फिर मुस्काने यूँ ठहरें,
सुबह शाम चारों पहरें,
लो एक नया दिन है ये लाया,
एक साल नया है फिर आया ।।

------------------------------------------ नीलाभ

Expression - Written half a decade ago this poem couldn't be more significant than today when we bid adieu to 2020, The Year of Pandemic. 
Wishing a Happy, Healthy and Safe New Year 2021. 


Friday, October 9, 2020

शहर..

ये शहर अनजाना सा है,
        कुछ जाना पहचाना भी है,
ये तो जानता हूँ मैं,
         एक दशक से मैं इसमें बसता हूँ,
पर ये ना जाना कभी,
          हौले से छुपकर ये भी मुझमें बसता है ।।

कभी मैं इससे, ख़फ़ा सा हो जाता हूँ
पूछता भी हूँ, कि क्यूँ तू वैसा नहीं है
जो देखते ही तुझसे,
इक इश्क़ सा हो जाये ।
नाराज़ भी होता हूँ इससे,
जो मेरे ख्वाबों का आकाश, कम दिखता है यहां से ।।

कभी जो रास्ते, सख़्त से हो जाते इस शहर के,
और ठोकरें खाकर, मेरे कदम हैं थक जाते,
आँसुओं के साथ, जो मिट्टी आँखों में है भर जाती,
तो कोस भी लेता हूँ, इसे ही जी भर के ।।

ये शायद चुपचाप, सुनता है मेरे ताने,
मेरी खामोशी, मेरी आवाज़, मेरे तराने, 

मैं याद करता हूँ, उन अंधेरी रातों को भी
जब हौसलों के टूट जाने पर,
एक टक देखता था मैं,
अकेले उस सूने आसमान की ओर,
तब ये शहर ही तो था,
जो करता था बात, मुस्कुराकर मेरी ओर ।।

मेरे कंधे पर हाथ रखकर,
संभाला भी तो था इसी ने,
मेरे लड़खड़ा कर गिरने पर, 
आँसू भी गिराए थे, शायद इसी ने ।।

हर सुबह ये शहर ही तो है, जो कहता है मुझसे,
दौड़ जब तक तेरे पाँव के छाले, खुद तेरा रास्ता ना बता दें,
कि बदलता तो रहेगा ही, पता मंज़िलों का तेरी
तू बस रुक ना जाना, राहों में कहीं
और पलकें जो हो जाएं, ग़र बोझिल तेरी 
थक कर सो भी जाना, मेरी बाहों में कभी

ये शहर, 
जो अनजाना सा लगता था कभी,
हाँ, 
अब जाना पहचाना लगता है यूँ ही ।।

------------------------------------------ नीलाभ

Expression - When I moved to this new city a decade ago, I had nothing but complaints. Year after year, those complaints grew but somewhere this city also gave me it's moments of love and hope. Deep down this is my version of Frank Sinatra's 'This town'

The thought behind this expression was inspired from a moment captured by a wonderful photographer and my dear friend Ankit Trivedi. All credits to him for the original thought.
Check out his work at his instagram handle @trivedi.jpeg

Saturday, May 9, 2020

कलम से गुफ्तगूं

बड़े दिनों बाद 
आज फिर यूँ कलम उठाया है,
कुछ कहने की आस लिए
ख़यालों को आज फिर जगाया है,

हाथों में लिए उसे 
जो हरफ़े लिखने की कोशिश की,
सोच ना था रूठकर 
वो भी कभी अड़ जाएगी,
ज़िद में वो आज
मुझसे भी आगे बढ़ जाएगी,

वो कहती है अब 
और ना लिख पाऊँगी,
बहुत कुछ कहा है तूने मुझसे,
अब औरों को ना कह पाऊँगी,
तेरे ख़्यालों को अब 
मैं आवाज़ ना दे पाऊँगी,

हाँ मैं वही हूँ...
जो कभी तेरे विचारों के लहरों में
जाने कितने दूर बह सी जाती हूँ,
कभी तेरे आँसुओं को समेट कर
स्याहियों में मैं ही समाती हूँ,
कभी किसी निर्झर सा स्वछन्द
मैंने तेरी अठखेलियों में साथ है दिया,
कभी तेरे भीतर सहमते विचारों को
मैंने भयहीन कर ब्रह्म का अस्त्र तुझे दिया,
पर यूँ ही आगे ना कर पाऊँगी,
वो फिर कहती है
अब और ना लिख पाऊँगी,

 हाँ.. मैं और ना लिख पाऊँगी,
 उन शब्दों को तेरे लिए 
ना मैं अब अपने रंगों से सजाऊँगी,
 कभी तेरे लिए रोज़ नए पंख बुने तो हैं मैंने
 पर अब तुझे और उड़ने को आकाश ना दे पाऊँगी,
वो कुछ ठहरकर कहती है
अब और ना लिख पाऊँगी,

फ़र्क क्या पड़ता है वो पूछती है,
ग़र मैं अब ना भी लिखूँ,
फ़र्क क्या पड़ता है अगर
अब तेरी आवाज़ ना भी बनूँ,
तेरे ख़्याल अगर बस तेरे ज़हन में रहे तो क्या बुरा है,
ग़र उन्हें अब कोई ना भी पढ़े तो कौन से ग़ुनाह है,

मैं उस रूठे साथी की ओर मुस्कुरा कर देखता हूँ,
जवाब तो कई हैं मेरे पास पर फिर भी सोचता हूँ,
जिस शिद्दत से मैंने कभी वो पहले शब्द लिखे थे अपने,
उसी शिद्दत से आज उसे वापस कहता हूँ,

फ़र्क ये नहीं है कि कोई पढ़े या ना पढ़े मेरे शब्दों को,
बात ये भी नहीं की महफ़िल बैठी है कहीं
सुनने मेरे नग़मों को,
क्योंकि मैं कोई सूर्य नहीं हूँ,
जो हर सुबह एक विशाल परिदृश्य को प्रकाश से भर दूँ,
ना ही मैं वो तरिणी हूँ,
जो पूरे गाँव की प्यास तृप्त कर दूँ,

तो फ़र्क शायद ना भी पड़े
मैं अगर ये मान भी लूँ कुछ पलों के लिए,
तो भी एक ग़म रह जाएगा,
कहीं एक छोटा से दिया
किसी आंगन को ज़रूर रौशन कर देता,
कहीं कुछ ओस की बूदें थी
जो एक चकोर की तृष्णा से मिल जातीं,
हाँ कहने को बहुत कुछ था 
और शायद मेरी आवाज़ सुनी भी जाती,
अगर मेरी प्रिये, आज तू यूँ रूठ कर ना बैठ जाती ।।

------------------------------------------- नीलाभ

Expression - Someday when I may loose myself and my love refuses to love me back. I may have this chat with my first love 'my poetry' only to convince her to reciprocate my love.

 हरफ़े = albhabets
निर्झर = spring / waterfall
स्वछन्द = free 
अठखेलियाँ = the state of being lively, spirited playful, carefree
शिद्दत = passionate
नग़मा = songs
तरिणी = river
तृष्णा = thirst

Friday, July 21, 2017

एक नदी

सूखी सी एक नदी
दूर कहीं किनारों को मिलते है देखती
रेत के फैले आकाश पे
अपने अरमानों को सिमटते है देखती

कभी नवयौवना सी
यूँ इठलाती थी जो
जलदर्पण में आज
स्वयं को प्रौढ़ होते है देखती

जीवन का प्रतीक बानी निर्झर सी कभी
जो एक चंचला सी थी
आज चार कदमों से चलने को
घने बादलों की राह है देखती

जीवन की एक ये कहानी
अब पूरी सी है होती
जो एक धारा से आरम्भ थी हुई
अब एक धारा सी बस है बहती

सूखी सी वो नदी
कुछ सोचकर है भी मुस्कुराती
आज नहीं, यहां नहीं
और कहीं, कभी और

किसी शिला को भेदकर
किसी की जटाओं में बंधकर
भूमि से निकलकर
हर बंधन को तोड़कर

आस पुनरागमन की लेकर
वो आंखें मूंद लेती है
अब भी कुछ बहती और थमती है
सूखी सी वो नदी ।।

------------------------------------------- नीलाभ

Expression - A river bed dried and empty often forces me to think what would be the river like when it was free from all bounds , alive and spirited. Rather than having pity over oneself the river promises to flow again breaking the barriers that have held it always. Isn't it true for the spirit that lives in all as does the Metaphors everywhere :)

नवयौवना = on the brink of youthful age.
जलदर्पण = mirror created by reflection in water.
प्रौढ़ = aged
पुनरागमन = return / second coming.

Friday, March 17, 2017

झूठ की उम्र

एक सच लिए मैं बैठा रहा शाम तक बाज़ार में
और झूठ वो सबके हाथों हाथ बिकते रहे इस कारोबार में

झूठ जो सबकी पसंद था
देखने में नया सा वसंत था
आकर्षक से कागज़ों में लिपटा हुआ
मेरे सूखे से सच पर एक व्यंग था

हाँ सच मेरा मजबूत तो था
पर कुछ सादा और बेरंग था
जगमगाता ना था और ना ही रंगीन था
लेकिन सच तो था वो इसका मुझे यकीन था

धुप में पसीना बहा मैं इंतज़ार करता रहा
सच का होगा कोई ख़रीदार ये ख़ुद से कहता रहा

सामने आलिशान सी दुकानों पे भीड़ बढ़ती रही
झूठ की उम्र सूरज के ताप सी चढ़ती रही
शाम ढले तक यूँ ही मैं खाली बैठा रहा
इस झूठ और सच के बीच के फ़र्क को समझता रहा

आखिर वो सच था इसलिए शायद फीका था
झूठ सा ना मसालेदार था ना तीख़ा था
सच शायद मेरा उतना चमकदार भी ना था
झूठ की रंगीनियों सा रंगदार ना था

फिर भी मेरे सच पे मुझे कितना अभिमान था
बाज़ार के ऊसूलों से मैं लेकिन कितना अंजान था

अँधेरा भी धीरे धीरे बढ़ने लगा
सच से भरी टोकरी उठा मैं वापस चलने लगा
बोझ मेरे सर पे सच का अब भी था
खाली हाथ घर लौटने का कुछ दर्द भी था

पर रास्ते में वो रंगीन से कागज़ फिर दिखे
मानो कुछ कहने समझने को बीच राह में ही रुक गये

कागज़ जो झूठ के रंगीन लिहाफ़ थे
सबसे पहले ही साथ छोड़ गये
सड़क के किनारे पड़े
कूड़े के ढेर से नाता जोड़ गये

इन कदमों को जो आगे बढ़ाया
तो कुछ और भी नज़र आया

झूठ के ढ़ेर रास्ते पे फैले से मिले
यूँ लगा मानो तंग आकर फेंके थे गये

यूँ ही चलते चलते मुझे झूठ
सड़क के हर छोर पे मिलता रहा
हर खरीदार को देके दग़ा
वो उम्मीद ऐ वफ़ा करता रहा

जिसे बेचा गया था बाज़ार में बड़े शोर के साथ
वो झूठ आधे दिन की भी दूरी ना तय कर पाया
वक़्त के तराजू पे जो तौल लिया आज उसे
तो सच के सामने उसका वजन ना ठहर पाया

उम्मीद जो शाम के अँधेरे में जाती सी रही
हर बढ़ाते कदम से फिर लौट आती रही
झूठ की उम्र जान कर मेरे
दिल में सच की रौशनी जगमगाती रही

अगले दिन की आस लिए मैं मुस्कुराकर चल दिया
ये सोच के की सच के बोझ में भी सुकून ज़रूर होगा
और कभी तो कोई ख़रीदार मेरे सच का भी होगा
जिसे आखिर सच की कीमत का अहसास होगा ।।

------------------------------------------- नीलाभ

Expression - Ever thought that doing the right thing is important but not always it is easy. Far more easy ways are readily available but they are not the "Right Ways". An Expression of dilemma, a conflict that often takes place deep within my heart when I question myself "Am I doing the Right thing, when others are ahead of me, taking easy ways"

नया सा वसंत = A new season of Spring
व्यंग = Satire
लिहाफ़ = Cover
दग़ा = Betrayal
उम्मीद ऐ वफ़ा = Expectation of Loyality

Monday, October 12, 2015

दौड़


आगे बढ़ने की दौड़ थी
हम भी साथ दौड़ते रहे
जाने कितनों से आगे दौड़ गए
जाने कितने हमसे आगे निकल गए

सालों तक ये सिलसिला चलता रहा
जो समझदार थे कहीं रुक कर बैठ गए
जो नासमझ थे उन्हें रुकता देख ठिठके तो ज़रूर
लेकिन फिर इससे हाथ आया मौका समझ
हंस कर और तेज़ी से आगे निकल गए
हम भी नासमझों की टोली में थे
रुकने का ख्याल राह के किनारे रख
भीड़ के साथ दौड़ते रहे

धीरे धीरे और आगे बढे
तो एक शक सा होने लगा
जो जितना दूर निकल आया था
वो उतना अकेला दिखने लगा था
मिलती तो थी उन्हें शोहरतों की बारिशें
पर साथ कोई था तो बस ख्वाहिशें

अपनी नासमझी पे अब हुआ यकीन जो हमें
हम भी दो पल के लिए यूँ ही थम से गए
आखिर इस दौड़ में कितना कुछ राह में ही हमनें खो दिया
ये सोचने जो पलकें बंद की तो उन्हें आंसुओं ने भिगो दिया

नमी सी आँखों में रख वापस पलटकर जो देखा
खुशियाँ तो सारी वहीँ उसी राह पे पड़ी थीं
जिसकी तलाश में हम आगे दौड़ते रहे
कमबख्त वो ज़िन्दगी दबे पाँव हमारे पीछे खड़ी थी ।।

---------------------------------------- नीलाभ

Expression :- Sometimes we forget and often ignore happiness, while chasing some  milestones that are a part of life but they ain't make life.
This expression suggests that all those years when you chased life for glory and luxury, you ignored the true purpose of life, to be happy.

Tuesday, June 23, 2015

बातें कुछ नयी सी पुरानी

किसी रोज़ एक नयी बात सी हुई थी
बचपन के गुज़रने की आहट सी हुई थी
उस रोज़ तुझे देखा था पहली बार मैंने नज़रें चुरा के
तू भी शायद मुझे देख कर हंसी थी

याद नहीं ठीक से सब कुछ
पर एक चाहत सी ज़रूर बसी थी दिल में
कभी मैं तेरा हाथ यूँ ही थामू
एक शाम तुझे मुस्कुराता देख ग़ुज़ारू

फिर एक रोज़ कुछ और भी हुआ था
तूने मुस्कुराकर मुझसे कुछ कहा था
उमर के हिसाब से एक दशक और बीत चुका था
पर मैं राह के उसी मोड़ पे रुका था

कुछ बातों सवालों और जवाबो के बीच
वो हंसी और मुस्कराहट खिली थी
कुछ कसमों और वादों से एक शाम हमने लिखी थी
ज़िन्दगी कुछ ख्वाब से दिखा आगे बढ़ चली थी

आज इस रोज़ जो वो सारी बातें याद करते हैं
हँस कर हम एक दूसरे को यूँ ही देखते हैं
बातें जो आज भी हमारी खत्म नहीं हैं होती
और शामें बस तेरा हाथ थामे ही हैं गुजरती

---------------------------------------- नीलाभ

Expression :- Though you always asked to write something for us and I never did that..
Though I hesitate to share what I feel for you on social media..
Yet after 3 years of the sacred vows and over a decade long relationship of togetherness I may be a chatterbox but I am still at loss of words when I write about us..
Yet I'll make an attempt.. So this one is for you
Happy Anniversary Wifey !!

Sunday, September 14, 2014

रास्ते.....

दिशाहीन सा खड़ा मैं चारो ओर रास्तों को देखता हूँ,
रास्ते जो अंतहीन से लगते हैं,
रास्ते जो किसी मंजिल का पता तो ज़रूर  बताते हैं,
पर खुद किसी भटके मुसाफ़िर से वहीं ठहर जाते हैं !!


जाने कितने अपनों को पास लाते हैं ये रास्ते,
हर उम्मीद को उसके दर तक पहुचाते हैं ये रस्ते
कभी बारातों के साथ भी नाच लेते हैं ये रास्ते,
विदा हुई डोली में  दुल्हन के आसुओं को पोछते हुए ये रास्ते
दीयों से सजते और कभी रौशनी से जगमगाए हुए ये रास्ते,
किसी गाँव को शहर से मिलाते हुए ये रास्ते
कभी भीड़ में खो भी जाते हैं ये रास्ते,
लेकिन हर रोज़ जाने कितने कदमों के साथ चलते हैं ये रास्ते !!


कभी लहू के रंगों से नहाए भी हैं ये रास्ते,
रंजिशों की खातिर इंसानी लाशों से ढके भी हैं ये रास्ते
मंदिरों मदरसों तक तो जाते हैं जाने कितने रास्ते,
कभी किसी काफ़िर को ख़ुदा तक क्यों नहीं लाते हैं ये रास्ते !!

बातें जाने कितनी की ... पर जवाब नहीं देते हैं ये रास्ते,
हादसों को बस खामोश देखते हैं ये रास्ते
मुझे बेज़ुबान होने का एहसास देते हैं ये रास्ते,
बस मेरी उम्र से कुछ ज्यादा लम्बे हैं ये रास्ते !!

---------------------------------------- नीलाभ

--Expressions: Ever tried standing at a lonely square and tried to look at the roads. Roads that go beyond your eyesight, Roads that each have a story to smile, a pain to share but yet those small tales are untold .... Sometimes I feel I am a meek spectator just like these roads, feeling everything yet failing to express...... An expression worth sharing.

काफिर = non- believer, atheist

Friday, March 9, 2012

तुम याद आओगे......

तुम याद आओगे....

सच्ची और झूटी कितनी बातों में...
जाने कितनी हुई शरारतों में....

... खिलखिलाहटों में..... मुस्कुराहटों में....
कभी सुनी कभी अनसुनी सी आहटों में.....
तुम याद आओगे....

चौकलेट के रैपर की आवाज़ में .....
किसी गीत की सुर और साज़ में ......

चाय की चुस्कियों भरी शाम में....
अपने से लगते हर नाम में....
तुम याद आओगे....

यारी दोस्ती के तरानों में ......
आज काम न करने के बहानो में......

ज़िन्दगी की आनेवाली नयी राहों में.....
हम सबकी दुआओं में.....
तुम याद आओगे....


---------------------------------------- नीलाभ

--Expressions: This one is for a very special team mate I have had for past 4 years.... I guess she was a pillar for me to work, the one who stood by all highs and lows faced in office. Will definitely miss such a good friend. (Written when she left the office and was transferred)

Wednesday, January 25, 2012

नायक की परिभाषा

हर श्रवण को लगा है, दशरथ का तीर
हर चौराहे पे लुटता है, किसी द्रौपदी का चीर
कहने को तो हैं, चारो ओर पांडव जैसे वीर
पर चुपचाप मर्यादा को लुटता देखना, है उनकी तकदीर

बिना आत्मा के जी रहे हैं.... ये शरीर
लेकिन आज हर आत्मा का बल चाहिए

आज चाहिए.... कृष्ण का छल
जो करे.... इस समर का हल

राजनीति की इन गलियों को
..... एक नया भविष्य चाहिए
सत्ता के इन प्यासों को
.... अब अमृत नहीं एक घूँट विष चाहिए
विदुर की नीति नहीं......
............ आज एक चाणक्य चाहिए
फकीर तो बहुत हुए..... आज एक वीर चाहिए

टीपू सा सुल्तान चाहिए,
..........पानीपत का मैदान चाहिए
भीष्म की प्रतिज्ञा और कर्ण का दान चाहिए
परिस्थिति में फंसे कुछ कदमों को आज फिर गीता का ज्ञान चाहिए

आँखों से आंसू नहीं, अब एक आग चाहिए
आज ग़ज़ल नहीं, सरफ़रोशी का राग चाहिए

कोमलांगी नहीं..... झाँसी की वीरांगना चाहिए
.....काली का साक्षात अवतार चाहिए......
आज हाथों में मेहँदी नहीं, हौसलों का संसार चाहिए
न कुछ कर पाओ तो..... पद्मा के जौहर का विस्तार चाहिए

आदमियों की इस भीड़ से .............
............... आज हमें इंसान चाहिए
समाज को अब बदलना है ..............
........ बस बदलने के लिए वो हाथ चाहिए

वास्तव में समाज को ऊँचे कद की ज़रुरत है
..... .ऐसा कद जो आसमान को छू जाए
पर ज़मीन से किसी को उठाने में ना हिचकिचाए
हर ग़म में खुद आंसू बहाए ...........
....... हर दर्द को खुद महसूस कर जाए

हाँ समाज को आज ऐसा व्यक्तित्व चाहिए.....
नायक की परिभाषा को एक नया अस्तित्व चाहिए


---------------------------------------- नीलाभ

--Expressions: This poem was written long ago while I was a student and as every young citizen feels the nation needed to change, I too felt the same.As the time passed on with varied socio-political-economic challenges ahead for our nation, this thought of change has only strengthened. But this change would need a revolution and every revolution needs a HERO.This poem simply describes my idea of hero by mentioning about some unique personalities of past in both history and mythologies that have inspired me ever since my childhood and it so draws attention towards their heroic deeds.

On this republic day I would dedicate this poem to all those HEROES in making who are still standing tall against a fragile system and in a phase of time that is filled with angst,anger and at the same time also accompanied with hope.


श्रवण (Shravan) = a Mythological character in Ramayana, who exhibited unparalleled devotion toward his parents and was accidentally killed by King Dashratha, while the latter was hunting.
दशरथ (Dashratha)= a Mythological character in Ramayana, King of Ayodhya, Father of Lord Rama, killed Shravan accidentally and was cursed by Shravan's dying parents to bear the agony of separation from his son which later resulted in his death.
समर = battle
विदुर (Vidur) = a Mythological character in Mahabharta, Prime Minister and Half Brother of King Dhritrashtra, Most respected advisory for his righteousness, devotion to the people's welfare, wisdom and statecraft.
चाणक्य(Chanakya) = Prime minister to Chandragupta Maurya around 350 BC, considered as the architect of Maurya empire; by his political tactics aided Chandragupta's rise as Emperor, famous as a genius in fields of political science and economics. Also known as Kautilya.
टीपू(Tipu) = Known as Tipu Sultan, Ruler of Mysore Kingdom around 1750-1800 AD, fought several battles with British to protect the sovereignty of his land.
पानीपत(Panipat) = a place in Northen India, close to Delhi, famous as battle ground where three major battles(Known as Battle of Panipat) were fought, that changed the course of Indian History.
भीष्म(Bheeshma/Bhishma) = a Mythological character in Mahabharta, famous for his vow of life-long celibacy, sacrificing his 'crown-prince' title for his half-brother and his descendants and protecting the kinship until his death.
कर्ण (Karna) = AntiHero of Mahabharta, one of the greatest warrior, who fought against misfortune throughout his life and kept his word under all circumstances. Famous for his charity and earned the name of 'daanveer' -lord of charity. Died in battle of Kurukshetra fighting against his own brothers for his friend Duryodhan(prime antagonist of Mahabharata)
सरफ़रोशी = sacrifice
कोमलांगी = one with a delicate body (used for the delicacy associated with a lady)
वीरांगना = warrior lady
पद्मा (Padma) = known as Rani Padmini, Queen of Chittor, chose to commited mass suicide (called Jauhar/जौहर) with all other women of Chittor by burning themselves in a huge pyre rather than face dishonour at the hands of the victorious enemy, when her husband Ratan Singh King of Chittor was defeated and died in battle protecting Chittor from invaders from Delhi Sultnate.
विस्तार = enhancement.

Thursday, April 14, 2011

जेब में रखा आखिरी सौ का नोट.......

जेब में रखा आखिरी सौ का नोट,
.... देख कर मुझे मुस्कुराता है
हँस कर पूछता है.. तारीख क्या है आज बता ज़रा
उँगलियों से ज्यादा, हैं दिन इस महीने के बाकी
मेरी बात पे ना हो यकीन, तो गिन के देख ले आज साकी
घबराया हुआ.... मैं जोड़ता हूँ तारीखें
इस मुसीबत से निकलने की, ढूँढता हूँ मैं तरकीबें
पर हो जो खाली तरकश, क्या ख़ाक निशाना सीखें
महीने का पहला दिन फिर क्या कहूं
..........कितना याद आता है
जेब में रखा आखिरी सौ का नोट,
.... देख कर मुझे मुस्कुराता है


अचानक मुझे हर दिन, एक सवाल सा लगता है
बचा हुआ महीना, किसी बुरे ख़याल सा लगता है
सोचता हूँ...... गुज़ारा कैसे होगा आगे
देगा कौन उधार, इसी ख़याल में मन जाने कहाँ भागे
खर्च करू या बचत, इस बात की जंग अब जोर पकडती है
बस की कतार क्यों लम्बी....... कुछ ज्यादा आज लगती है
घिसे हुए जूतों पे और जोर देना.... अब तो मजबूरी लगती है
मेरे माथे पे देख के शिकन की लकीरें
............... वो इठलाता है
जेब में रखा आखिरी सौ का नोट,
.... देख कर मुझे मुस्कुराता है


यार दोस्त भी अब............. पराये से लगते हैं
जो वापस मांगते हैं उधार, वो जल्लाद के साए लगते हैं
मुस्कुराती सखियों को देख......... अब नज़रें फेर लेता हूँ
चाय पर चलने को वो पूछें, इससे पहले मैं बिल जोड़ लेता हूँ
फिर मेरे ज़हन में ख्याल....... उन सैकड़ों परिंदों का आता है
ख्वाब उड़ने का आँखों में रख, जिन्हें आसमान नहीं मिल पाता है
छोटा ही सही मेरे नसीब में........ मेरा आसमान तो आता है
थोड़ा ही सही पर इस आखिरी नोट को देख
..............अब सुकून सा आता है
जेब में रखा आखिरी सौ का नोट,
.... देख कर मुझे मुस्कुराता है

---------------------------------------- नीलाभ

तरकश = quiver

--Expressions: Somethings in life can't be measured and what can be measured doesn't always gives life a meaning. A thought which tries to figure out balance between both these facts and ends up bringing a smile of satisfaction.
This idea emerged with a random funny thought when the bills weighed more than the amount I had and the idea finally flourished to what you read.

Saturday, March 26, 2011

चले जाते हैं ........

दिल से करो कोशिश तो बनते हैं रिश्ते
इश्क कब का रुसवा हुआ हमसे.....
अब हम कोशिशों से जीए जाते हैं

बेवाफईयों से उनकी हमने भी एक सौदा कर लिया
हम उनकी बेवफाई.....................
और वो हमारी वफ़ा को नज़रंदाज़ किये जाते हैं

उनका दामन पाक तो था हमेशा
वो हमारी नेकी ...........
उनके जुर्म हम अपने सर लिए जाते हैं

रुसवाई कम ना मिली हमें उनसे
याद करना तो दूर..........
मिल के अब नाम पूछे जाते हैं

उनकी सलामती पर बैर खुदा से हमने कर लिया
उन्हें मिली जन्नत ...................
और हम काफिर कहे जाते हैं

इश्क की गली में आज भी घर है उनका
बस हम ही आज ..............
ज़रा उस दर पे कम जाते हैं

---------------------------------------- नीलाभ


--Expressions: The most common topic for any poet, brilliantly explained by many is "Love".... But Love stills has age old definitions and often depicts another never changing emotion pain.... So this effort describes yin-yang relationship between Love and Pain .... Just another expression.

काफिर = non- believer, atheist

Sunday, January 30, 2011

मकान एक पुराना सा

बड़ी इमारतों के बीच एक मकान कुछ पुराना सा है....
बेजान तहजीबों के शहर में जैसे भटका कोई मुसाफ़िर बेग़ाना सा है....

कभी ऊंचे पर्वत सी शिलाओं को देख मेरा मकान पुराना घबराता सा है
कभी इन सजीले नव आगंतुओ को देख कुछ शर्माता सा है
नए नवेले युवाओं को देख अपनी उम्र छुपाता सा है
वैभव देख उनकी अपना सर झुकाता सा है

कभी अपनी जीर्ण अवस्था पर मन ही मन आँसू बहाता सा है
जीवन के बिखरे पालो को समेट फिर भरमाता सा है
नव वधुओं के स्वागत को कर स्मरित लजाता सा है
अपने आँगन में खेले बच्चों को कर याद मुस्काता सा है

याद करता है रिश्तों की पूँजी को बढ़ते हुए
दादा को पोते के साथ फिर बच्चा बनते हुए
माँ की लोरी सुन खुद भी सो जाता सा है
पिता के कंधो पे नयी पीढ़ी को बिठाता सा है

होली पे प्रेम के रंगों में भर जाता सा है
दीवाली पे झिलमिल जगमगाता सा है
तीज पे हरियाली की समृद्धि दे जाता सा है
चौथ पे चाँद को आँगन में उतार लाता सा है

आगे बढ़ने की होड़ में... हाँ आज पीछे रह जाता सा है
पर याद कर अपने अतीत को गर्व से हर्षाता सा है

---------------------------------------- नीलाभ


--Expressions: With change in times somethings still remain the same.... Lets accept those unchanged ones and give them the respect they deserve.... because they are the roots to where we actually belong.

तहजीबों = manners/culture
आगंतुओ = visitors

Sunday, July 4, 2010

कुछ अलग से लोग हैं...

हाँ कुछ अलग से लोग हैं......
शहर भी कुछ अलग सा है....

चेहरों पे जाने कितने चेहरें
सच का रंग है कच्चा और झूठ के दाग हैं गहरे
जिंदगी को समझते हैं बिसात
.......................... हैं इंसानों को समझते मोहरे
भावनाओँ की ना थी कोई जगह, ना कोई काम है
फायदे का गर है सौदा, तो खुशी के भी दाम हैं
हाँ कुछ अलग से लोग हैं......
शहर भी कुछ अलग सा है....

खुदा के घर पे ठहरा है सन्नाटा
पर रस्ता जो बदल के देखा तो मयखानों में है भीड़
ऊँचे मकान तो है मगर
................. मिलता नहीं क्यों प्यार से भरा एक नीड़
इंसानीयत है अपाहिज यहाँ, और मासूमियत अनाथ है
पैमाने है मिल के छलकते, आंसू जो छलके तो देता नहीं कोई साथ है
हाँ कुछ अलग से लोग हैं......
शहर भी कुछ अलग सा है....

बदले सोच जैसे बदले है धूप
बदलती परिभाषाओं में सुंदरता भी है कुरूप
अस्मिता को मार स्वयं ठोकर
......................... नारी का है ये नया रूप
सड़कों के किनारे घुमते बच्चे , कुछ असहाय कुछ अधनंगे हैं
सादगी है मर चुकी और चेहरे बस दिखावों के रंगों से रंगे हैं
हाँ कुछ अलग से लोग हैं......
शहर भी कुछ अलग सा है....


---------------------------------------- नीलाभ


--Expressions: Times have changed, so have people or is this a different place with different people at different times.

नीड़ = Nest
अस्मिता = Dignity

साये की रात.........

आधी रात को दूर एक शहर..... कुछ सोता कुछ जागता सा है....
कुछ घर अँधेरे की आगोश में यूँ झिलमिलाते हैं
अंदर रहने वालों का हाल सा बता जाते है
कभी दूर एक सड़क भी दिखाई देती है
वहीँ लगी रौशनी से वो नहाई सी लगती है
हाँ वहीँ सड़क के किनारे कुछ साये भी हैं
सच कहूँ तो इंसान नहीं....... वो साये ही हैं
रात के अँधेरे में समा से जाते हैं वो साये
सडक पर फैली धुंध में खो से जाते साये

पूस की रात में एक झोंका हवा का चलता है
एक ठिठुरन सी मेरे अंदर भरता है

मैं फिर सड़क के किनारे उन सायों को देखता हूँ
उनके तन पर सिमटे कुछ कपड़ों को देखता हूँ
कपड़े नहीं.. चीथड़ों में लिपटे
उन शरीरों को भी ठिठुरते देखता हूँ
ज़िंदा रहने का संघर्ष कुछ और ज़ोर पकड़ता है
जीने की ख्वाहिश लिए एक साया और दम तोड़ता है
रात ने फिर इंसान से मुँह फेरकर किया जिंदगी से दगा है
मौत ने मुस्कुरा कर एक बेसहारे को साथ ले लिया है
पर इंसानों की बस्ती से आज कौन रुखसत हुआ है?

हौसले और संघर्ष से भरा मिटटी का एक और शरीर ढह गया है
और उज्जवल भविष्य का सपना लिए आँखें मूँद समाज सो गया है


-------------------------------- नीलाभ


--Expressions: Some varied thoughts, some varied feelings, some varied emotions, some varied truths and just an expression.

लौटा दो..................

कुछ पुरानी किताबें लौटा दो
उन किताबों पे बनी तस्वीर लौटा दो
साथ लौटा दो वो कहानियाँ
जिन कहानियों में शेर और चूहों की थी दोस्ती
लौटा दो वो किस्से
जहाँ इमानदारी की सीख थी मिलती
वो रेत के महल, वो मिटटी के खिलौने लौटा दो
या मेरे कागज के हवाई जहाजों को, उड़ने का फिर एक मौका दो

कुछ अनजान से सवाल लौटा दो
मासूम से मेरे जवाब लौटा दो
छुट्टियाँ वो गर्मी की लौटा दो
वो जाड़े की अलाव लौटा दो

मेरा कुछ और भी था
जो खो गया था बड़े होने की होड़ में
कभी ज़िंदगी से कदम मिलाने
तो कभी उससे जीतने की दौड़ में
हो सके तो लौटा दो वो सुकून की नींद
जो आती माँ के गोद में
या फिर पिता के हौसला देते हाथ
जिन्हें पकड़ कर सीखा गिरकर संभालना हर बार

गर ये लौटा ना पाओ तो बस एक आरज़ू लौटा दो
कुछ खेलने कुछ जीतने की ख्वाहिश लौटा दो
साथ लौटा दो वो नादानी जो सिखाती थी साथ देना सिर्फ सच का
वो भोलापन जो बताता था फर्क अच्छे और बुरे का

वो मासूमियत जो मेरे चेहरे से खो गयी
और लौटा दो वो इंसानियत जो दिल के किसी कोने में सो गयी

--------------------------------- नीलाभ

--Expressions: There are somethings in life which are often missed as time passes by. One of them is the time when we grow up..... Everything during this period is the best of the things that just happen once in a lifetime and throughout the life we want them back.

ज़िंदगी – कर एक वादा

ए ज़िंदगी कभी तो कर साथ देने का एक वादा
देख तेरे हर दगा को मुस्कुरा के सहा है
देख तेरे हर सितम को है सीने से लगाया
तेरे हर दर्द को है होंठों पे सजाया
तेरे हर आँसू को है पलकों पे छिपाया
फिर भी दिल में है कुछ ऐसा इरादा
हर गम से है मुस्कुराने का वादा
पर अब तू भी तो कर इतनी रहमत
की ज़िंदगी, ज़िंदगी रहे, ना बन जाए उल्फत
ज़ख्म इतना ही रहे, की नासूर न बन जाए
जीना भी कुछ ऐसा ही रहे, की कसूर न बन जाए

------------------------------------------ नीलाभ

--Expressions: Just another expression depicting pain.

Saturday, July 3, 2010

अस्त का अर्थ

सूरज मेरे सामने डूब रहा है
पेड़ों के पीछे कुछ छिप रहा है
नीचे पानी पर उसकी प्रतिमा दिख रही हैं
दूर क्षितिज पर उसकी लालिमा चमक रही है

दृश्य था वह अत्यंत मनोरम
प्रकृति की इस रचना के आगे कल्पनालोक का सौंदर्य भी था कम
अचानक मन में एक विचित्र प्रश्न आया
की अस्त का अर्थ है आखिर क्या?

सूर्य का ढलना है किसका प्रतीक?
क्या ये नहीं निराशा का प्रतीक?
अस्त से क्या प्रेरणा हम
जब ये करे ऐसा संकेत मानो सब कुछ हो रहा हो खत्म

जवाब की तलाश में मन ना जाने कहाँ भटकने लगा
दूर वहीँ सूरज डूबने लगा
मैं आत्ममंथन करने लगा
और अपने ही प्रश्नों में उलझने लगा

सूरज का डूबना नहीं है अंत का संकेत
इसके पीछे है नव सृजन का उद्देश्य
सूरज डूबते हुए करता है ये वादा सदा
की मैं लौट कर आऊंगा लेकर सवेरा नया

सूरज का जाना नहीं लाता है निराशा
अपितु करता है केवल इतना इशारा
की आनेवाली है एक नयी भोर
लेकर फिर नयी आशा

अस्त केवल इतनी प्रेरणा देता है
की हर अस्त के बाद पुनः उदय है
हर निराशा के बाद एक आशा है
हर प्रवास पे लौटने का एक वादा है

यही सोचते सूरज अब पूरा डूब चुका था
और मुझे मेरे प्रश्नों का सही उत्तर मिल चुका था

-------------------------------------------- नीलाभ

--Expressions: Written long back with a thought that even sunset can have different meaning other than just farewell.

Friday, April 2, 2010

तलाश......

क्या जाने मैं ढूँढता हूँ..........
..........इक बुझी सी राख में
मिल जाए कोई ख्वाहिश........
...जल चुके अरमानो की ख़ाक में
ज़िन्दगी के सेहरा में खो गया हूँ इस कदर
की वापस चलता हूँ कुछ पड़ाव...
.... अपनी पहचान की तलाश में


क्या जाने मैं ढूंढता हूँ........
.......सन्नाटे के हर पयाम में
ढूंढता हूँ मैं तरन्नुम.........
.........खामोशी के बाज़ार में
हो गयी है अब खामोशियों की आदत इस कदर
की सुन रहा हूँ अब हर आहट....
.....अपनी आवाज़ की तलाश में


क्या जाने मुझे मिलता है......
..दर्द के बीच भी उस मुस्कान में
है यही तो वो इंसानी जज्बा....
.....जी रहा हूँ जिसकी आस में
वर्ना दुनियावालों ने तो मिटा दी है मेरी शख्शियत इस कदर
की भीड़ से रोज़ गुज़रता हूँ....
....खुद को पाने की तलाश में




-------------------------------------------- नीलाभ

--Expressions: This poem was written just to introspect about some beautiful feelings that came to me, or went away from me in this wonderful journey called........ life.


सेहरा = desert
पयाम = message
तरन्नुम = melody